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मेडिकल (चिकित्सा) विशेषज्ञों के अनुसार, नियमित और अधिक मात्रा में शराब का सेवन, असुरक्षित यौन संबंध और इस्तेमाल की गई सुइयों से दवाओं का इंजेक्शन लगाना यह लिवर (यकृत) कैंसर के सामान्य कारण है।
लिवर (यकृत) कैंसर या हिपैटिक कैंसर तब होता है जब लिवर सेल्स (यकृत कोशिकाएं) या हेपेटोसाइट्स अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं। हेपाटोसेलुलर कार्सिनोमा (एचसीसी) लिवर (यकृत) कैंसर का सबसे प्रचलित प्रकार है। लिवर (यकृत) कैंसर या तो लिवर (यकृत) में शुरू हो सकता है या वह अन्य भागों से लिवर (यकृत) में फैल सकता हैं।
लिवर (यकृत) कैंसर भारत में सबसे आम कैंसर में से एक है, और यह महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक प्रचलित हैं। कैंसर विशेषज्ञों के अनुसार, लिवर (यकृत) कैंसर से जुड़े सामान्य जोखिम कारकों में शराब का अधिक सेवन, असुरक्षित यौन संबंध और इंजेक्शन की सूई साझा करना शामिल हैं।
लिवर (यकृत) कैंसर से जुड़े महत्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं
लिवर (यकृत) कैंसर का वास्तविक कारण अज्ञात है; हालाँकि, शोधकर्ताओं ने कुछ जोखिम कारकों की पहचान की है जो लिवर (यकृत) कैंसर से संबंधित हैं :
क्रोनिक (दीर्घकालिक) हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण को लिवर (यकृत) कैंसर के लिए सबसे बड़े जोखिम कारकों में से एक पाया गया है।
क्रोनिक (दीर्घकालिक) लिवर डिसऑर्डर (यकृत विकार) जैसे कि सिरोसिस या जो आनुवंशिक रुप से मिले हो (जैसे हेमोक्रोमैटोसिस) वो लिवर (यकृत) कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं।
शराब के अत्यधिक सेवन से लिवर (यकृत) सिरोसिस हो जाता है, जो बाद में लिवर (यकृत) कैंसर का कारण बन सकता है।
जिन लोगों का लिवर (यकृत) कैंसर का पारिवारिक इतिहास होता है उन लोगों में लिवर (यकृत) कैंसर के विकसित होने का जोखिम अधिक होता है
मोटे व्यक्तियों में लिवर (यकृत) कैंसर होने का जोखिम अधिक होता है।
लिवर (यकृत) कैंसर की घटनाएं महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक होती हैं।
एचआईवी, हेपेटाइटिस बी संक्रमण आदि जैसी स्वास्थ्य स्थितियों के कारण जिन लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है उन लोगों में लिवर (यकृत) कैंसर विकसित होने का जोखिम अधिक होता है।
तम्बाकू का उपयोग लिवर (यकृत) कैंसर के गठन का कारण बनता है।
एफ्लाटॉक्सिन जहरीले पदार्थ होते हैं जो कुछ फसलों, जैसे गेहूं, मक्का, नट्स, मूंगफली, सोयाबीन आदि पर उगने वाले फफूँद से निकलते हैं। लंबे समय तक एफ्लाटॉक्सिन के संपर्क में रहने से लिवर (यकृत) कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
टाइप - 2 डाइअबीटीज़ (मधुमेह) वाले लोग, विशेष रूप से जिन्हें हेपेटाइटिस का भी निदान हुआ है, उन्हें लिवर (यकृत) कैंसर होने का खतरा अधिक होता है।
जो लोग आर्सेनिक प्रदूषित कुओं का पानी पीते हैं, उनमें लिवर (यकृत) कैंसर सहित कई तरह की बीमारियों के होने का खतरा अधिक होता है।
हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण वाले लोग, शराब से संबंधित सिरोसिस, शराब का सेवन करने वाले लोग, और हेमोक्रोमैटोसिस के परिणामस्वरूप सिरोसिस वाले लोग इन सभी को लिवर (यकृत) कैंसर का जोखिम अधिक होता है। उन्हें नियमित लिवर (यकृत) कैंसर की स्क्रीनिंग (जाँच) पर विचार करना चाहिए क्योंकि इससे बीमारी का प्रारंभिक चरणों में पता लगाने में मदद मिलती है। यदि लिवर (यकृत) कैंसर का जल्दी पता नहीं लगाया जाता है, तो इसका इलाज और प्रबंधन करना काफी चुनौतीपूर्ण होता है।
चूंकि लिवर (यकृत) कैंसर अपने प्रारंभिक चरण में कोई लक्षण नहीं दिखाता है, इसलिए इसका जल्द पता लगाने का एकमात्र तरीका स्क्रीनिंग (जाँच) है। यदि स्क्रीनिंग (जाँच) के दौरान लिवर (यकृत) कैंसर का संदेह होता है, तो निश्चित निदान के लिए निम्नलिखित अतिरिक्त परीक्षणों की सिफारिश की जा सकती है।
अल्फा - फेटोप्रोटीन (एएफपी) लिवर (यकृत) ट्यूमर द्वारा स्रावित एक रसायन होता है। जिन लोगों में एएफपी का स्तर बढा हुआ होता है उन लोगों को लिवर (यकृत) कैंसर के लिए अतिरिक्त परीक्षणों पर विचार करना चाहिए, क्योंकि लिवर (यकृत) कैंसर के 70% मामलों में यह प्रोटीन उत्पन्न होता है। आयरन (लोहे) का अधिक स्तर भी ट्यूमर की उपस्थिति का संकेत दे सकता है।
आमतौर पर अल्ट्रासाउंड इमेजिंग की सिफारिश की जाती है क्योंकि यह एक मिलीमीटर जितने छोटे ट्यूमर की भी पहचान कर सकता है। हाई-रिज़ॉल्यूशन सीटी स्कैन और कंट्रास्ट एमआरआई छवियों का उपयोग करके इन ट्यूमर का निदान और स्टेजिंग किया जाता है।
बायोप्सी के दौरान संदिग्ध क्षेत्र से ऊतक का नमूना इकठ्ठा किया जाता है और माइक्रोस्कोप के तहत उसकी जांच कि जाती है। स्थिति के निश्चित निदान के लिए यह परीक्षण आवश्यक है।
विभिन्न स्थितियों में जैसे की छोटे ट्यूमर का पता लगाने के लिए, सिरोसिस की मात्रा का निर्धारण करने के लिए, बायोप्सी के लिए नमूना इकठ्ठा करने के लिए और यहां तक कि पिछले परीक्षणों के परिणामों की पुष्टि करने के लिए भी लेप्रोस्कोपी की सिफारिश की जा सकती है।
लिवर (यकृत) कैंसर मरीज़ों के लिए उपचार की योजना बनाने के लिए मरीज़ की उम्र, उसकी कुल स्वास्थ्य स्थिति और व्यक्तिगत प्राथमिकताएं, साथ ही रोग का चरण, ट्यूमर का आकार, ट्यूमर का सटीक स्थान और ट्यूमर का ग्रेड जैसे कई कारकों पर विचार किया जाता है। लिवर (यकृत) कैंसर प्रबंधन के लिए निम्नलिखित उपचार विकल्प उपलब्ध हैं :
सर्जरी लिवर (यकृत) कैंसर के लिए सिफारिश किए जाने वाले मुख्य उपचार विकल्पों में से एक विकल्प है। रोग के चरण के आधार पर, डॉक्टर द्वारा विभिन्न सर्जिकल प्रक्रियाओं का सुझाव दिया जाता हैं।
पूरे लिवर (यकृत) या लिवर (यकृत) के कुछ हिस्से को सर्जरी द्वारा निकालने की प्रक्रिया को लिवर (यकृत) रिसेक्शन कहा जाता है। पार्शल हेपेटेक्टोमी के मामले में, ट्यूमर को स्वस्थ ऊतक के छोटे हिस्से के साथ निकाल दिया जाता है। फुल हेपेटेक्टोमी के दौरान, लिवर (यकृत) को पूरी तरह से निकाला जा सकता है।
आमतौर पर जिन मरीज़ों के ट्यूमर का ऑपरेशन नहीं किया जा सकता है या तो ट्यूमर के स्थान के कारण या लिवर (यकृत) का बड़ा हिस्सा बीमारी से प्रभावित होने के कारण मरीज़ के लिए सर्जरी को सहना मुश्किल हो सकता है, उन मरीज़ों के लिए लिवर ट्रांसप्लांट (यकृत प्रत्यारोपण) सर्जरी एक उपचार विकल्प है। शुरुआती चरण के कैंसर जिसमें रोग आस-पास के अंगों में नहीं फैला होता है उन मरीज़ों को लिवर ट्रांसप्लांट (यकृत प्रत्यारोपण) सर्जरी की काफी हद तक सिफारिश की जाती है।
एब्लेशन लिवर (यकृत) कैंसर के लिए सिफारिश किए जाने वाले उपचार विकल्पों में से एक है, और यह लिवर (यकृत) को निकाले बिना ट्यूमर को नष्ट कर देता है। आमतौर पर जिन मरीज़ों के ट्यूमर छोटे होते हैं या ऐसी कोई स्वास्थ्य स्थिति होती है जिसमें मरीज़ के लिए सर्जरी से गुजरना मुश्किल होता है उन मामलों में एब्लेशन की सिफारिश की जाती है। लिवर (यकृत) कैंसर के लिए एब्लेशन उपचारात्मक दृष्टिकोण नहीं है; हालाँकि, यह कुछ मरीज़ों के लिए मददगार हो सकता है।
क्रायएब्लेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें ठंडी गैसों का उपयोग करके कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को जमाया जाता है और मार दिया जाता है।
रेडियोफ्रीक्वेंसी ट्यूमर को गर्म करने और कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए हाई - एनर्जी (उच्च - ऊर्जा) रेडियो तरंगों का उपयोग करती है। एक पतली, सुई जैसी प्रोब का उपयोग किया जाता है जिसके माध्यम से ट्यूमर को नष्ट करने के लिए हाई - फ्रीक्वेंसी (उच्च आवृत्ति) विद्युत प्रवाह प्रवाहित किया जाता है।
इस उपचार पद्धति में ट्यूमर को नष्ट करने के लिए माइक्रोवेव तरंगों का उपयोग किया जाता है।
इस प्रक्रिया में कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए गाढे अल्कोहल को सीधे ट्यूमर में इंजेक्ट करना शामिल है।
ट्यूमर सेल्स (कोशिकाएं) ऑक्सीजन और पोषक तत्वों के बिना जीवित नहीं रह सकतीं और रक्त की आपूर्ति के माध्यम से ट्यूमर सेल्स (कोशिकाएं) इन बायोमोलक्यूल्स (जैव अणुओं) को प्राप्त करती हैं। एम्बोलिज़ेशन थेरेपी लिवर (यकृत) कैंसर के लिए एक उपचार विकल्प है, जिसमें ट्यूमर के रक्त प्रवाह को प्रतिबंधित या सीमित करने के लिए विशिष्ट रसायनों को सीधे लिवर की धमनी में इंजेक्ट किया जाता है।
टीएई एक चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें ट्यूमर या असामान्य ऊतकों की रक्त की आपूर्ति बंद करना शामिल है। इस प्रक्रिया के दौरान, जांघ की अंदरुनी बाजू में एक छोटा चीरा (कट) लगाया जाता है, और एक कैथेटर (एक पतली और लचीली ट्यूब) डाला जाता है और ट्यूमर या असामान्य ऊतक के पास एक धमनी में निर्देशित किया जाता है। एक बार कैथेटर स्थिति में होने के बाद, छोटे कणों को धमनी में इंजेक्ट किया जाता है ताकि ट्यूमर को ऑक्सीजन और पोषण प्राप्त करने से रोका जा सके।
टीएई एक चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें ट्यूमर या असामान्य ऊतकों की रक्त की आपूर्ति बंद करना शामिल है। इस प्रक्रिया के दौरान, जांघ की अंदरुनी बाजू में एक छोटा चीरा (कट) लगाया जाता है, और एक कैथेटर (एक पतली और लचीली ट्यूब) डाला जाता है और ट्यूमर या असामान्य ऊतक के पास एक धमनी में निर्देशित किया जाता है। एक बार कैथेटर स्थिति में होने के बाद, छोटे कणों को धमनी में इंजेक्ट किया जाता है ताकि ट्यूमर को ऑक्सीजन और पोषण प्राप्त करने से रोका जा सके।
यह एक विशेष एम्बोलाइज़ेशन प्रक्रिया है जो एम्बोलाइज़ेशन और कीमोथेरेपी दोनों को संयोजित करती है। ज्यादातर मामलों में, टेस - टीएसीई को कैथेटर के माध्यम से सीधे धमनी में कीमोथेरेपी देकर शुरू किया जाता है, फिर कीमो दवा ट्यूमर के करीब रहे यह सुनिश्चित करने के लिए धमनी को सील कर दिया जाता है।
यह उपचार दृष्टिकोण रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) और एम्बोलिज़ेशन को संयोजित करता है। इस प्रक्रिया के दौरान, सम्मिलित कैथेटर के माध्यम से रेडिओएक्टिव पदार्थों को मोती के रुप में इंजेक्ट किया जाता है। ये रेडिओएक्टिव मोती धमनी में रहते हैं और कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए निश्चित अवधि में थोड़ी मात्रा में रेडिएशन (विकिरण) छोड़ते हैं।
इस उपचार पद्धति में उच्च खुराक रेडिएशन (विकिरण) के साथ लिवर (यकृत) कैंसर का इलाज करना शामिल है। रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) एक नान - इनवेसिव (बिना चिरफाड वाली) प्रक्रिया है जिसे उपचार की कुल प्रभावकारिता को बढ़ाने के लिए अन्य उपचार विकल्पों के साथ संयोजित किया जा सकता है। उन्नत चरण के लिवर (यकृत) कैंसर के मरीज़ों में दर्द और अन्य जटिलताओं को कम करने में भी रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) मदद कर सकती है।
कीमोथेरेपी लिवर (यकृत) कैंसर के लिए सिफारिश किए जाने वाले सामान्य उपचार विकल्पों में से एक है। सर्जरी से पहले ट्यूमर को सिकोड़ने के लिए (नियोएडजुवेंट कीमोथेरेपी) या सर्जरी के बाद बची हुई कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए (एडजुवेंट कीमोथेरेपी) डॉक्टर कीमोथेरेपी की सिफारिश कर सकते हैं । उपचार की कुल प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए कीमोथेरेपी को अक्सर अन्य उपचार विधियों, अर्थात् रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) और एम्बोलिज़ेशन के साथ संयोजित किया जाता है। रोग के कारण होने वाले लक्षणों को कम करने के लिए इसका उपयोग उपशामक देखभाल के एक भाग के रूप में भी किया जाता है।
लिवर (यकृत) कैंसर के लिए इम्यूनोथेरेपी रोग से लड़ने के लिए मरीज़ की प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित करके काम करती है। अधिकांश कैंसर विशिष्ट प्रकार का प्रोटीन छोड़ते हैं जो प्रतिरक्षा सेल्स (कोशिकाओं) को उन पर हमला करने से रोकते हैं। हालांकि यह लिवर (यकृत) कैंसर के लिए उपचार की मुख्य पंक्ति नहीं है, कुछ लिवर (यकृत) कैंसर के मरीज़ों के लिए इम्यूनोथेरेपी सहायक हो सकती है।
टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) कैंसर के इलाज के लिए उपयोग किया जाने वाला एक उपचार दृष्टिकोण है, और यह कैंसर के विकास और प्रसार में सहायता करने वाले विशेष जीन, प्रोटीन या ऊतक वातावरण को लक्षित करता हैं। लिवर (यकृत) कैंसर के मामले में, टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) एंटी-एंजियोजेनेसिस दवाओं का उपयोग करते हैं। ये दवाएं नई रक्त वाहिकाओं के निर्माण को रोकती हैं और ऑक्सीजन और आवश्यक पोषक तत्वों को ट्यूमर तक पहुंचने से रोकती हैं।
हां, लिवर (यकृत) कैंसर का इलाज संभव है। रोग के चरण के आधार पर उपचार योजना बनाई जाती है। प्रारंभिक चरण के लिवर (यकृत) कैंसर के लिए कई उपचार विकल्प उपलब्ध है और उत्कृष्ट नैदानिक परिणाम मिलते हैं, जबकि उन्नत चरण के लिवर (यकृत) कैंसर के लिए कम उपचार विकल्प उपलब्ध होते हैं।
लिवर (यकृत) कैंसर का इलाज करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि शुरुआती चरणों में इसका निदान किया जाए। पेट में कोई भी असामान्य लक्षण जो दो सप्ताह से अधिक समय तक रहता है, उसके लिए चिकित्सक से परामर्श किया जाना चाहिए।
यह ट्यूमर के ग्रेड पर निर्भर करता है। सभी लिवर (यकृत) कैंसर तेजी से नहीं बढ़ते हैं। जिन कैंसर का हाई ग्रेड के रूप में निदान किया जाता है, वे कम ग्रेड के रूप में निदान किए जाने कैंसर की तुलना में तेजी से बढ़ते हैं।
हाई ग्रेड या कम ग्रेड, लिवर (यकृत) कैंसर के सफल प्रबंधन के लिए उचित उपचार और सख्त फालो अप योजना महत्वपूर्ण हैं।
फैटी लिवर के सभी मरीज़ों में लिवर (यकृत) कैंसर विकसित नहीं होता है। हालांकि, विशिष्ट प्रकार के फैटी लिवर (यकृत) के मरीज़ों, जैसे कि नान-अल्कोहोलिक फैटी लिवर रोग (एनएएफएलडी) और नान-अल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (एनएएसएच) में लिवर (यकृत) कैंसर विकसित होने का जोखिम अधिक होता है।
लिवर ट्रांसप्लांट (यकृत प्रत्यारोपण) सर्जरी जटिल प्रक्रिया नहीं है और आम तौर पर सफल होती है। सफलता दर दाता और प्राप्तकर्ता के कुल स्वास्थ्य, उनकी उम्र आदि जैसे कारकों द्वारा निर्धारित की जाती है।
नया लिवर (यकृत) या उसके हिस्से को प्राप्तकर्ता के शरीर द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने की संभावना होती है इसलिए प्राप्तकर्ता को इम्यूनोसप्रेसेन्ट दवाएं दी जाती हैं । मरीजों को डॉक्टर द्वारा सुझाई गई इन दवाओं को लेना चाहिए। इसके अलावा, डॉक्टर कई आहार और जीवन शैली सुधारों का सुझाव भी दे सकते हैं। अंग अस्वीकृति के जोखिम को कम करने के लिए मरीज़ के लिए उपचार के बाद के नियमों का सख्ती से पालन करना महत्वपूर्ण है।
हालांकि लिवर (यकृत) कैंसर को पूरी तरह से रोकने का कोई तरीका नहीं है, लिवर (यकृत) कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए आप कुछ उपाय कर सकते हैं :